जल में कुम्भ कुम्भ में जल है,
बाहर भीतर पानी, फुट घट जल जल ही समाना ये तट जानो जनि...
कबीर की इस पंक्ति में कितना गहरा अर्थ छुपा है इसका अंदाजा इसी बात से मिलती है की इस गूढ़ वाक्य को दर्शन से लेकर इः लोक के रिश्तों पर भी घटा कर देख सकते हैं.
जब तक हमारा यह घट होता है उसपर कितना नाज़ करते हैं. अहम्, अपराध, घोटाले और न जाने क्या और किस हद तक गिर जाते हैं.
इक बार घट फुट नहीं की वह कहाँ, किस जल्नीधि में समाहीत हो जाता है यह परदे के उस पर का दृश्य है. जो इन नेत्रों से परे है.
अपना हर कण, हर पल, हर साँस यैसे जीना चाहिए जैसे यही अंतिम और पहली हो. न जाने घट कब विलीन हो जाए.
बाहर भीतर पानी, फुट घट जल जल ही समाना ये तट जानो जनि...
कबीर की इस पंक्ति में कितना गहरा अर्थ छुपा है इसका अंदाजा इसी बात से मिलती है की इस गूढ़ वाक्य को दर्शन से लेकर इः लोक के रिश्तों पर भी घटा कर देख सकते हैं.
जब तक हमारा यह घट होता है उसपर कितना नाज़ करते हैं. अहम्, अपराध, घोटाले और न जाने क्या और किस हद तक गिर जाते हैं.
इक बार घट फुट नहीं की वह कहाँ, किस जल्नीधि में समाहीत हो जाता है यह परदे के उस पर का दृश्य है. जो इन नेत्रों से परे है.
अपना हर कण, हर पल, हर साँस यैसे जीना चाहिए जैसे यही अंतिम और पहली हो. न जाने घट कब विलीन हो जाए.
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